नागरिकता निर्धारण में राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, न कि वोट बैंक की राजनीति को

मोदी सरकार दूसरे कार्यकाल में अपने चुनावी वायदों को पूरा करने के लिए किस तरह प्रतिबद्ध है, इसका एक उदाहरण तीन तलाक पर कानून का निर्माण करने से मिलता है और दूसरा कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने से। इन दोनों वायदों को पूरा करने के बाद मोदी सरकार अब नागरिकता कानून में संशोधन को लेकर संकल्पबद्ध दिख रही है। केंद्रीय कैबिनेट ने नागरिकता संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है। इस विधेयक के मसौदे का कई राजनीतिक दल विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले दल वही हैं जो अतीत में पूर्वोत्तर में होने वाली घुसपैठ को लेकर शुतुरमुर्गी रवैया अपनाए रहे। इसी रवैये के कारण वे असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का भी विरोध कर रहे हैं। इन दलों के विपरीत भाजपा प्रारंभ से यह कहती आ रही है कि असम में घुसपैठ रोकने के साथ ही बाहर और खासकर बांग्लादेश से आए लोगों की पहचान होनी चाहिए। नागरिकता रजिस्टर के जरिये यही काम किया गया है। भाजपा की यह भी दलील है कि अवैध घुसपैठ से न केवल देश के संसाधनों पर बोझ बढ़ रहा है, बल्कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में स्थानीय संस्कृति के लिए खतरा भी पैदा हो रहा है। यह खतरा काल्पनिक नहीं है, क्योंकि असम में बांग्लादेश से आ बसे लाखों लोगों के कारण स्थानीय भाषा, संस्कृति खतरे में पड़ गई है। इन लोगों ने स्थानीय नेताओं का संरक्षण पाकर राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र तक हासिल कर लिए हैं। ऐसे लोगों को वोट बैंक राजनीति के चलते अभी भी संरक्षण मिल रहा है। बांग्लादेश से अवैध रूप से असम आए लोगों के कारण इस राज्य के साथ अन्य पड़ोसी राज्यों के विभिन्न हिस्सों राजनीतिक-सामाजिक माहौल बदल गया है। कई हिस्सों में स्थानीय लोग अल्पसंख्यक हो गए हैं या फिर उनके वोटों के बजाय बाहरी लोगों के वोट निर्णायक बन गए हैं। हैरानी है कि कई राजनीतिक दल इस सच्चाई का संज्ञान लेने की जरूरत नहीं समझ रहे हैं। वे इसकी भी अनदेखी कर रहे हैं कि कहीं बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ किसी साजिश का हिस्सा तो नहीं? बांग्लादेश से आए लोगों एक बड़ी संख्या मुसलमानों की है और वे उत्पीड़न नहीं, बल्कि बेहतर आर्थिक जीवन की लालसा में अवैध रूप से भारत आए हैं, जबकि हिंदू और बौद्ध उत्पीड़न से त्रस्त होकर। इसी को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में आस्था रखने वाले पड़ोसी देशों से आए सैकड़ों परिवारों की नागरिकता का रास्ता खुलेगा तो उससे उनका बेहतर भविष्य सुनिश्चित होगा। पता नहीं नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे दल यह देखने को तैयार क्यों नहीं कि बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक आबादी कितनी तेजी से घटती जा रही है? इन तीनों देशों में हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, ईसाइयों, पारसियों आदि की आबादी में कमी का एक बड़ा कारण उनका उत्पीड़न है। इस उत्पीड़न से बचने के लिए आम तौर पर वे भारत की ओर ही रुख करते हैं। इसका कारण उनका यह भरोसा है कि वे यहां निर्भय होकर अपना जीवन बिता सकते हैं, लेकिन उनकी नागरिकता विवाद का विषय बन गई है। इसी के साथ एनआरसी के जरिये 19 लाख लोगों को बाहरी करार देने का मसला भी विवाद का कारण बना हुआ है। असम के लोग जहां इससे नाखुश हैं कि इतने कम लोगों को ही अवैध नागरिकों के तौर चिन्हित किया गया वहीं भारत सरकार की समस्या यह है कि इनमें तमाम हिंदू हैं। असम के कई संगठन इन बांग्लाभाषी हिंदुओं को भी शरण देने का विरोध कर रहे हैं। इनमें से कुछ नागरिकता विधेयक के भी विरोध में हैं। नागरिकता संशोधन विधेयक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले वहां के अल्पसंख्यकों यानी हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, ईसाइयों और पारसियों को कुछ शर्तों के साथ नागरिकता देने का प्रावधान है। इन देशों के मुसलमानों को इसलिए बाहर रखा गया है, क्योंकि बहुसंख्यक होने के नाते उनके उत्पीड़न की गुंजाइश नहीं। सरकार का तर्क है कि इन तीनों देशों के जो मुसलमान भारत आते हैं वे बेहतर जीवन- यापन के इरादे से आते हैं और ऐसे लोगों को उत्पीड़ित लोगों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वास्तव में उत्पीड़न के शिकार लोगों और बेहतर जीवन की तलाश में आए लोगों में भेद करने को न तो अन्याय कहा जा सकता है और न ही यह दलील दी जा सकती है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यक भारत के अलावा अन्य किसी पड़ोसी देश में आसानी से शरण पा सकते हैं। कांग्रेस समेत अन्य दलों का मानना है कि प्रस्तावित नागरिकता संशोधन विधेयक भारतीय मूल्यों और खासकर पंथनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है, लेकिन आखिर वे इसकी अनदेखी कैसे कर सकते हैं कि भारतीय कानून भारत के लोगों पर लागू होते हैं, न कि बाहर से गैर कानूनी तौर पर आए लोगों पर। अगर इस तथ्य को अनदेखा किया जाएगा तो फिर दुनिया भर के देशों से अवैध रूप से आए लोग यही मांग करेंगे कि उनमें और भारतीय नागरिकों में भेद न किया जाए। क्या यह मांग मानना संभव है? भारतीय संविधान का समानता संबंधी कानून उन्हीं पर लागू हो सकता है जो भारतीय नागरिक हों। नागरिकता विधेयक का विरोध कर रहे दलों को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह तय करने का अधिकार भारत के पास है कि वह किसे शरण अथवा नागरिकता दे या न दे? इस अधिकार का इस्तेमाल करते समय राष्ट्रीय हितों पर ध्यान देना आवश्यक है। क्या यह राष्ट्रीय हित में होगा कि पूर्वोत्तर भारत में बाहर से आए ऐसे लोगों को भी बसने दिया जाए जो स्थानीय संस्कृति के लिए खतरा बन रहे हैं? जो विपक्षी दल नागरिकता विधेयक का विरोध कर रहे हैं उन्हें यह समझना होगा कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों और वहां के बहुसंख्यकों को एक नजर से देखने का औचित्य नहीं बनता। बेहतर होगा कि इस विधेयक पर विचार करते समय राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाए, न कि वोट बैंक की राजनीति को। यह राजनीति पहले ही देश का बहुत नुकसान कर चुकी है।